Wednesday, May 22, 2024
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Soft Signal Rule क्यों बना देता है अंपायर्स को ‘धृतराष्ट्र’ जो पता होते हुए भी, देना पड़ता है उन्हें गलत डिसीज़न

दोस्तों आज हम चर्चा करेंगे कि सॉफ़्ट सिग्नल रूल क्या होता है, इसके चलते सब कुछ पता होते हुए भी अंपायर्स को कभी कभी ग़लत डिसिज़न क्यों देना पड़ जाता है तो क्या ICC को Soft Signal Rule में परिवर्तन करते हुए ‘मुझे नही मालूम’ का विकल्प शामिल करना चाहिए ?

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Cricket’s Soft Signal Rule क्यों बना देता है Umpires को अंधा? | Why Soft Signal Rule Making Umpires Blind

Soft Signal के प्रति उठ रहे बहुत से प्रश्नों का सरल और सीधा उत्तर ये संभव है कि Soft Signal में मैदानी अंपायर के निर्णय को Decision के तौर पर नहीं, अपितु Opinion की तरह देखा जाना चाहिए। Third Umpire को मैदान पर मौजूद अंपायर की उस सलाह पर स्वयं के स्तर से ठोस परिणाम तक पहुंचने का प्रयास करना चाहिए।

इंग्लैंड और भारत के मध्य खेले गए फोर्थ टी 20 मैच में इंडियन टीम ने विजय प्राप्त कर पांच मुक़ाबलों की शृंखला में 2-2 से बराबरी कर ली है। मुक़ाबला भारत के पक्ष में रहा, परंतु, इस के दौरान Third Umpire के दो निर्णय इंडियन टीम के विरुद्ध रहे। इन निर्णयों पर लगभग सभी इंडियन क्रिकेट प्रेमियों ने अपना असंतोष व्यक्त किया। कुछ व्यक्तियों ने Third Umpire की तुलना ‘धृतराष्ट्र’ तक से कर दी। इंडियन टीम के कैप्टन विराट ने इन निर्णयों पर प्रश्न उठाते हुए बोला कि Umpire के पास ‘मुझे नहीं पता’ का निर्णय सुनाने का विकल्प क्यों नहीं होता है। असल में, सॉफ्ट सिग्नल रूल के कारण Third Umpire ने 2 गलत डिसीजन लिए थे एवं अब इसी पर बवाल हो रहा है। सॉफ्ट सिग्नल एवं इस झगड़े पर जाने से पूर्व यह समझ लेते हैं कि आख़िर Soft Signal होता क्या है?

सॉफ़्ट सिग्नल नियम क्या है? | What Is Soft Signal Rule In Cricket

2014 में ICC (इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल) ने Soft Signal Rule को लागू कर दिया था। सॉफ़्ट सिग्नल पर ICC के नियमानुसार, यदि बॉलर एंड पर खड़ा Umpire किसी निर्णय के प्रति दुविधा की स्थिति में होता है, तो वह Third Umpire की तरफ रुख़ कर सकता हैं। मगर ये करने से पूर्व उन्हें आउट अथवा नॉट आउट में से एक Soft Signal देना होता है। सॉफ्ट सिग्नल रूल के अनुसार, यदि Third Umpire ठीक नतीजे पर नहीं पहुँच पाते हैं, तो मैदान पर मौजूद अंपायर का लिया गया सॉफ्ट सिग्नल डिसीजन ही बरकरार रहता है। DRS (डिसीजन रिव्यू सिस्टम) में भी On Field Call का इस प्रकार का ही एक रूल अप्लाई होता है।

कहां से विवाद शुरु हुआ?

विवाद शुरुआत कर रहे सूर्यकुमार यादव के विकेट के साथ आरंभ हुआ था। सूर्यकुमार यादव के लगाए शॉट को डेविड मलान ने बाउंड्री लाइन पर कैच कर लिया। रीप्ले में स्पष्ट दिख रहा था कि बॉल ने मैदान को टच किया है। थर्ड अंपायर ने इसको बहुत से एंगल से देखा परंतु फिर भी किसी परिणाम पर नहीं पहुँच सके एवं सॉफ्ट सिग्नल पर ही बने रहने का निर्णय दे दिया। इंडियन इनिंग के अंतिम ओवर में सीमा के पास इत्यादिल राशिद ने वॉशिंगटन सुंदर का कैच लिया। इस समय कैमरे में दिखाई दे रहा था कि उनका पैर बाउंड्री लाइन से टच हो गया था। यहाँ भी Third Umpire ने सॉफ्ट सिग्नल को ही यथावत् रखा।

अंपायर को ‘Superman’ न समझिए | Do Not Consider Umpire As ‘Superman’

पिच के पास मौजूद एक अंपायर थर्ड मैन या फाइन लेग अथवा सीमा-रेखा पर ली गई कैच अथवा Six पर अपना निर्णय सॉफ्ट सिग्नल से किस तरह दे सकते हैं। अंपायर की भी आम लोगों की भांति दो आंखें ही होती हैं। स्वयं से इतनी डिस्टेंस पर वह ‘क्लियर कैच’ या ‘बम कैच’ का फैसला किस प्रकार से दे सकता है। Umpires के पास ‘चील की तरह आंख’ अथवा सुपरमैन वाली नज़र तो है नहीं, जो एक छोटी से छोटी चीज़ भी सरलता से देख लें। आईसीसी को Soft Signal में परिवर्तन करना चाहिए एवं ‘मुझे नही पता’ अथवा ‘मेरी नज़र से दूर था’ वाला ऑप्शन जोड़ना चाहिए।

सॉफ्ट सिग्नल को मैदानी अंपायर की ‘सलाह’ मानें ‘डिसीजन’ नहीं | Don’t Treat The Soft Signal As A Decision, Take It Only As Advice

सॉफ्ट सिग्नल के प्रति उठ रहे बहुत से प्रश्नों का सरल और सीधा जवाब ये संभव है कि सॉफ्ट सिग्नल को मैदानी अंपायर के ‘निर्णय’ (Decision) नहीं, अपितु ‘राय’ (Opinion) की तरह देखा जाना चाहिए। थर्ड अंपायर को फील्ड अंपायर की उस सलाह पर स्वयं के स्तर से ठोस परिणाम तक पहुंचने का प्रयास करना चाहिए। यदि थर्ड अंपायर बहुत कोशिश के बाद भी किसी ठोस परिणाम पर नहीं पहुँच पाता है, तो बैट्समैन को ‘बेनिफिट ऑफ़ डाउट’ मिलना चाहिए।

ICC को सॉफ्ट सिग्नल रूल में परिवर्तन करना चाहिए | Time For ICC To Act On Soft Signal

आईसीसी को इस मैटर में अपने रूल्स में थोड़ा परिवर्तन करना चाहिए। सॉफ्ट सिग्नल को मैदान पर मौजूद अंपायर का लास्ट डिसीजन नहीं मानना चाहिए। मैदान पर मौजूद अंपायर्स डिसीजन लेने में सहायता लेने के लिए ही Third Umpire के पास जाते हैं। मेरा यह मानना है कि इस प्रकार की परिस्थितियों में जब थर्ड अंपायर स्वयं ही असमंजस में हो, तो उसे ‘बेनिफिट ऑफ़ डाउट’ का अपना निर्णय देना चाहिए। ना कि, मैदान पर मौजूद अंपायर के डिसीजन के साथ जाना चाहिए।

अंपायर्स के मध्य की बातचीत को समाप्त न करें, टेक्नोलॉजी को दें बढ़ावा | ICC Needs Technological Improvement

ऐसे दौर में जब टेक्नोलॉजी के चलते क्रिकेट एक शानदार खेल बनता जा रहा है। थर्ड अंपायर के पास बात करने के लिए जाने से पूर्व सॉफ्ट सिग्नल देने का रूल कुछ असामान्य लगता है। इस प्रकार की परिस्थितियों से बचने के लिए Umpires के बीच बातचीत को इस प्रकार से अनदेखा नहीं करना चाहिए। आईसीसी को फील्ड में तकनीक को और भी अधिक प्रभावपूर्ण तरह से अपनाना चाहिए। आईसीसी को मुकाबलों के समय 3D कैमरों के प्रयोग को प्रोत्साहन देना चाहिए, जिससे कि वह इन रही-बची कमियों को भी खत्म कर पाए।

गलत डिसीजन पर अंपायर ही दोषी | Only Umpire Is Guilty On Wrong Decisions

किसी भी क्रिकेट मैच में एक विकेट भी काफी कीमती होता है। सॉफ्ट सिग्नल के कारण से किसी भी मुकाबले का रुख़ सरलता से बदल सकता है। आईसीसी को स्वयं के नियम में परिवर्तन के साथ ही तकनीक पर और अधिक बल देना चाहिए। हालांकि, इंडिया और इंग्लैंड के मध्य प्ले किए गए चौथे टी 20 मुकाबले में गलत और खराब निर्णयों का आरोप थर्ड अंपायर के सिर ही मड़ा जाएगा। रीप्ले में स्पष्टतया दिख रहा था कि बॉल फ़ील्ड से टकरा रही थी। ये कहना अनुचित नहीं होगा कि सॉफ्ट सिग्नल के रूल ने Umpires को ‘धृतराष्ट्र’ बना दिया है।

दोस्तों उपरोक्त लेख को पढ़कर क्या आपको भी लगता है कि ICC को Soft Signal Rule में परिवर्तन करते हुए ‘मुझे नही मालूम’ अथवा ‘मेरी नज़रों से दूर था’ वाला विकल्प शामिल करना चाहिए। अगर आपको भी ऐसा लगता है तो नीचे कॉमेंट बॉक्स में अपनी राय देना ना भूले कि किस तरह से ICC अपने इस नियम में सुधार कर सकती है साथ ही अपने क्रिकेट प्रेमी मित्रों के साथ इस पोस्ट को शेयर करना ना भूलें।

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